ईरान के मामले में चीन की सोच यहाँ ट्रंप से हो रही है आमने-सामने
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ईरान के मामले में चीन की सोच यहाँ ट्रंप से हो रही है आमने-सामने

25-Sep-2026

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे से कुछ दिन पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची बीजिंग पहुँचे थे. इससे इस बात को बल मिलता है कि ईरान पर चीन का कितना असर है.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे से कुछ दिन पहले ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची बीजिंग पहुँचे थे. इससे इस बात को बल मिलता है कि ईरान पर चीन का कितना असर है.

ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाक़ात में ईरान युद्ध सबसे अहम मुद्दों में शामिल है.

सात महीने पहले ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से चीन का रुख़ नहीं बदला है. उसने ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमलों की निंदा की है. चीन ने ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका के प्रतिबंधों का भी विरोध किया है.

इसके साथ ही चीन लगातार युद्ध ख़त्म करने की मांग करता रहा है. वह ख़ास तौर पर चाहता है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को दोबारा खोला जाए.

चीन अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है. उसके पास बड़ा तेल रिज़र्व है. इसी वजह से वह अब तक ईरान युद्ध के असर को काफ़ी हद तक संभाल पाया है.

सेफ़ ज़ोन में रहना चाहता है चीन

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ एक्सेटर में चीन और मध्य-पूर्व मामलों के जानकार आंद्रेया गिज़ेली कहते हैं कि चीन इस स्थिति को लंबे समय तक संभाल सकता है. लेकिन समय बीतने के साथ इसका आर्थिक बोझ बढ़ता जाएगा.

उनके मुताबिक़, चीन युद्ध ख़त्म कराना चाहता है, लेकिन उसे इसके साथ अपनी दूसरी अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं का भी ध्यान रखना होगा.

डॉक्टर गिज़ेली कहते हैं, "चीन नहीं चाहता कि यह संघर्ष अमेरिका के साथ उसके रिश्तों में परेशानी पैदा करे. लेकिन वह ऐसा कोई क़दम भी नहीं उठाएगा, जिससे ईरान के बुनियादी हितों और मांगों को नुक़सान पहुँचे."

वह कहते हैं, "ईरान और चीन की सोच आम तौर पर एक जैसी है. दोनों मानते हैं कि अमेरिका और इसराइल की आक्रामक कार्रवाई के कारण यह युद्ध शुरू हुआ और अब तक जारी है."

ऊर्जा और अर्थव्यवस्था

इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के हामिदरेज़ा अज़ीज़ी कहते हैं कि चीन ऊर्जा का एक बड़ा उपभोक्ता है. इसलिए युद्ध जारी रहने से उसे नुक़सान हो रहा है.

अमेरिका के ऊर्जा सूचना प्रशासन की 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, चीन में इस्तेमाल होने वाली कुल ऊर्जा में तेल की हिस्सेदारी क़रीब पांचवां हिस्सा है. लेकिन चीन अपनी ज़रूरत का 70 फ़ीसदी से ज़्यादा तेल दूसरे देशों से ख़रीदता है.

पिछले साल चीन ने ईरान से हर दिन क़रीब 14 लाख बैरल तेल ख़रीदा था. यह चीन के कुल कच्चे तेल आयात का केवल 12 फ़ीसदी था. वहीं, मध्य पूर्व के बाक़ी देशों की हिस्सेदारी 42 फ़ीसदी थी.

ईरान और खाड़ी के दूसरे देशों से मिलने वाले तेल में जो कमी आई, उसका कुछ हिस्सा चीन ने रूस, ब्राज़ील और दूसरे निर्यातक देशों से तेल ख़रीदकर पूरा कर लिया है. लेकिन इस क्षेत्र से मिलने वाली गैस का दूसरा विकल्प तलाशना कहीं ज़्यादा मुश्किल होगा.

चीन के पास कुल कितना तेल जमा है, इसे गोपनीय रखा जाता है. हालांकि, अनुमान है कि 2025 में उसके पास 100 से 140 करोड़ बैरल तेल का भंडार था.

अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में चीन की ऊर्जा नीतियों पर शोध करने वाली एरिका डाउन्स कहती हैं, "अगर युद्ध शुरू होने के समय चीन के पास क़रीब 140 करोड़ बैरल तेल जमा था, तो 2025 में मध्य-पूर्व से होने वाले आयात के हिसाब से यह तेल 254 दिनों तक चल सकता था."

उनका कहना है कि चीन का तेल भंडार इससे भी लंबे समय तक चल सकता है, क्योंकि युद्ध के बावजूद मध्य-पूर्व से कुछ तेल अब भी चीन पहुंच रहा है.